देखा जब मार मादा को
सड़क किनारे असहाय
बड़े - बूढ़े और बच्चों को
एक जूट समाय
नीर क्षीर बिन खड़े निरंतर
ढूँढते कोई उपाय
हज़ारों की भीड़ में
कैसे वो घर जायें
कश्मकश ये समझ ना पाया
मन! आज रोना आया।
अर्थ व्यवस्था टूट गयी
कहकर उनको भागा दिया
सालों भर की मेहनत को
क्षणभर में तुमने भुला दिया
उनके छोटे बच्चों को देख
क्या तुम्हारा मन ना घबराया?
मन! आज रोना आया ।।
खुद को साहब कहलवाते थे
बड़े बाबू बन आते थे
सलामी ठोक,पैर दबवा
सब घर का काम करवाते थे
दो वक्त की रोटी देनी हो तो
वो भी ना कर पाते थे
फिर भी इन मज़दूरों ने
हँस कर सब बोझा ढोया
मन! तू आज फिर रोया।
समय गति को समझ ना पाए
बढ़ -बढ़ कर बर्बादी होगी
जो आज उनका हाल है
कल वही तुम्हारी होगी
मत सोचना कि तुम अमर हो
कोई अदभुत शक्ति है पाया
मन! आज रोना आया ।।
नीति शिखा

No comments:
Post a Comment